शनिवार, 16 फरवरी 2013

क्षणिकाएं - 1

एक 

उस के   निकलती शराब की बू को
सूंघ लेते हैं लोग बड़ी दूर से
खोजी कुत्तो की तरह
पर उसके जलते दिल की तीखी गंध को
कोई महसूस नहीं कर पाता

दो 

ऊपर आग है
नीचे समंदर
बीच में है हम दोनों
थोड़े जलते हुए
थोड़े डूबते हुए

तीन 

हम दोनों ने उस समय प्यार किया
जब आस पास रोज बन रहे थे नए नए तालिबान
रोज एक कारतूस खरीदी जाती
हमारे सीने में उतारने के लिए
रोज एक नया फतवा जारी होता हमारे नाम
रोज एक शरियत नाजायज बताती हमरे इश्क को
पर हर रोज हम सांस लेते
मस्जिद में गूंजने वाले अजान की तरह

चार 

तुम्हारे इश्क में पड़ने का मामला
दुनिया ने इतना संगीन बनाया
की कभी  तुम्हे इजराइल
तो कभी मुझे फिलिस्तीन बनाया

पांच

समय के गर्भ में
गहराई तक धंसे हुए हैं
सुनहरे स्मृतियों के जर्जर अवशेष
जितना अन्दर जाता है वर्तमान का फावड़ा
यादों का एक हसीन टुकड़ा निकल आता है
जिसे मैं आंसुओं से धोकर
पोंछ देता हूँ  मुस्कराहट के  से रुमाल से
और रख लेता हूँ अपने जेब में वो टुकडा
आने वाले कई वर्षों तक रोने के लिए, मुस्कुराने के लिए

रविवार, 30 दिसम्बर 2012

सुनामी

वो आग लगते रहे शहर में 
हमने चुपचाप बर्फ ओढ़कर जीना सीख लिया 
वो दहकने लगे 
बर्फ पिघलने लगी 
हम नंगे होने लगे 
और छिप गए घरो में जले का जख्म लेके 
वो खुले आम घूमते रहे शहर में 
अपने पौकेटों में जलती आग लेकर 
हम नारे लगाते रहे 
अपने घर के छज्जों पर खड़े होकर 
और लहुलूहान होते रहे 
वो कहकहे लगाते रहे 
और मजबूत होते रहे 
वो जालाना सीख चुके थे 
और हमने पिघलना क़ुबूल कर लिया था 
पर अब जब हम पिघल कर 
बन चुके हैं एक समंदर 
वो दुबके से बैठे हैं अपने छतो पर 
माचिस की तीली लिए हुए 
सुनामी की खबर से डरे हुए 

अराहान 

30 दिसम्बर 2012 

बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012

बदलाव

उनकी नजरो के जबसे हैं  शिकार बने
तबसे मर्ज-ए -मोहब्बत में हैं बीमार बने 
वो पलट के पूछते भी नहीं हाल हमारा 
हम ही मरीज और हम ही तीमारदार बने 
हंटर चला देती हैं हम पर इनके जैसी शोख हसीनाएं 
बेशर्म हम हैं जो इन जैसो के आशिक हर बार बने 
जबसे शौक़ चढ़ा है उनको रंगीन चुन्नियों का 
तबसे हम खुद में ही एक मीना बाजार बने 
मुस्कुराकर कभी जिसने हमको देखा भी नहीं 
हम  है की उनकी मुस्कराहट के तलबगार बने 
जबसे पिया है एक कतरा उनके शरबती आँखों का 
तबसे हम हैं आबशार बने 
रात दिन है आस की वो आएंगे करीब 
घर की चौखट पे खड़े खड़े हम चौकीदार बने 
सुनायी देती है कानो में जबसे उनके सांसो  की मौसीकी 
उनके सरगम में उलझे हम सितार बने 
छीनने लगी हैं वो छनकाके  पायल, करार हमारा 
उनकी कदमो की आहट  सुनकर हम बेकरार बने 
इश्क के अंजुमन में ऐसे हुए हम गिरफ्तार 
की काबिल से बेकार बने 
ऐसा लुटाया हमने उनपे अपना सबकुछ 
दुनिया की बात छोडिये हम खुद के है कर्जदार बने 
इतनी मोहब्बत , फिर भी हासिल कुछ नहीं 
हम  चाइनीज  सामानों के खरीदार बने 
"एकतरफा इश्क " शीर्षक से छपी एक कहानी 
हम कहानी के एक अहम् किरदार बने 
डूब गए गुमनामी के समंदर में 
इश्क में हम जो इतने वफादार बने 
वो बेखबर मेरे इश्क से, माशूका बन गयी किसी और की 
और हम देवदास के दिलीप कुमार बने 

अराहन 



वापसी

लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में 
जहाँ वर्षो से मेरे इन्तेजार में खड़ा है एक खंडहरनुमा घर 
अपनी खिडकियों में कुछ बेचैन आँखों को टाँके हुए 
अपनी दरकती दीवारों में टूटने का सबब संभाले हुए 
लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में
मैं लौट जाना चाहता हूँ फिर से उसी घर में 
जिसके अहाते में चावल चुन रही एक बूढी औरत चौंकती कौवों की कांव कांव पर
उसे अभी भी  यकीन होगा इस कहावत पर की
"सुबह का भुला लौटता है शाम को"
और इसी लिए वो हर शाम दिया रख जाती होगी दरवाजे पर
मैं लौट जाना चाहता हूँ फिर से उसी घर में
जिसके किसी कमरे में एक बूढ़ा
अख़बार में धुंध रहा होगा गुमशुदा लोगो की फेहरिस्त में किसी का नाम
और खुद को दे रहा होगा तसल्ली की
दुनिया के किसी कोने में जल ही रहा होगा उसके घर का चिराग

अरहान

आजादी

हमलोग जेल की दीवारों पर
लिखते रहे खून से  आजादी की कवितायेँ 
जेल के रोशनदान से भेजते रहे 
आजाद हवाओ को प्रेमपत्र 
हाथो में जडी लोहे की बेड़ियों से भी की हमने 
अपने आजाद दिनों की बाते 
दीवाल पर रेंगती छिपकलियों को भी हमने बताया 
की 6X 8 के इस तंग कमरे में भी ढूंढा जा सकता है एक आजाद कोना 
एक अपना कोना जहाँ हम गुलाम होते हुए भी जाता सकते हैं अपना स्वमित्व 
जी सकते हैं एक बादशाह की तरह इस काल कोठरी में 
हम लोगो बीस साल जेल में कैद नहीं थे 
यूँ कहें तो हम लोगो ने जिया था उन बीस सालो को 
एक आजाद पंछी की तरह 

अराहान 

26 दिसंबर 2012 

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

मेरे रात का एक हिस्सा


कभी तुम चुपके से चुरा लेना
मेरी रात का एक टुकडा
और सो जाना मेरे रात के हिस्से में
तुम्हे पता चलेगा की
चाँद के लाख चमकने के बावजूद भी
मेरी रातें कितनी अँधेरी हैं
चैनो सुकून के सारे साजो सामान के बावजूद भी
कितनी बेचैनी है मेरे रातों में
तुम्हे पता चलेगा की
क्यों मेरी चुप्पी
जलती है मेरी डायरी में
क्यूँ तुम्हारी बाते आते है मेरे शायरी में
क्यूँ मेरी रातों का कोई सवेरा नहीं होता
क्यूँ मेरे ख्वाबों के परिंदों का
कोई बसेरा नहीं होता
क्यूँ मेरे खयालो में तेरा नाम बसता है
क्यूँ हिज्र की आग में मेरा दिल जलता है
कभी तुम चुपके से चुरा लेना
मेरे रात का एक टुकडा
और सो जाना मेरे रात के हिस्से में
तुम्हे पता चलेगा की
तुम्हारे प्रति मेरा पागलपन कितना जायज और लाजिमी है
कितना बेसब्र है मेरे रात का हर एक पल
तुम्हारे बाजुओं में बीतने के लिए

ब्रजेश कुमार सिंह "अरहान"

सृजन


मुझे नहीं पता है भौतिकी के सिद्धांतो के बारे में 
ना ही मुझे विज्ञान की थोड़ी सी भी समझ है 
ना ही मैं न्यूटन हूँ 
ना ही आइंस्टीन फिर
पर फिर भी  मैं 
अपने छोटे से तंग अँधेरे कमरे में 
तुम्हारे जुल्फों से रात बना सकता हूँ 
तुम्हारे चेहरे से चाँद बना सकता हूँ 
तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से 
टिमटिमाते सितारे बना सकता हूँ 
तुम्हारे सुर्ख गुलाबी होठों से 
फूल बना सकता हूँ 
है मुझमे इतनी काबिलियत की मैं तुम्हारे स्पर्श से 
एक नया संसार बना सकता हूँ 

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"